Resolve conflict

मतभेद से मनभेद तक, उस पीढ़ी से इस पीढ़ी तक

एक वो पीढ़ी, बुज़ुर्गों कीबड़ी हुई घृणा के दौर मेंभारत का विभाजन देखाकिन्तु हमें  दिया सुनहरा,सुरम्य बचपनसमस्त प्रतिकूलता से भिन्न.

मुझे याद आता है. कुछ सुन्दर सा बचपन. सूर्योदय के साथ ही कर्ण में फैलता ‘वन्दे मातरम’ रेडियो पर. सुन्दर और शांत. सभा प्रारंभ होने का द्योतक और दिवस प्रारंभ का प्रतीक. सर्व धर्मों के गीत विविध भारती पर – सूफ़ियाना कलाम भी और संस्कृत के मंत्र भी, गुरबाणी के शब्द भी और ईशु के गान भी. स्कूल में क्रिसमस पर ईसा मसीह की झांकी में ऐसा प्रतीत होता था कि ईश्वर साक्षात् हैं, उस छोटे बाल ईशु पर स्नेह आता था. और फिर हर मंदिर के सामने से सर झुका के जाना, घंटी बजाने को आतुर होना. मज़ार पर जाना चादर चढ़ाना और लमलेट हो जाना क़दमों में फ़कीरों के. एक मौलवी जी थे, जो पिताजी का हाल चाल पूछने अस्पताल आते थे जब वो एक्सीडेंट से घायल थे. रोज़ आते, पिताजी के लिए ख़ुदा से दुआ करते और कहते,’ दुआ कर दी है, सब ठीक है.’ लगता जैसे अल्लाह साथ है तो क्या फ़िक्र है. दिगंबर जैन मंदिर में जाना अपना हक समझ कर, तीर्थंकरों की मूर्ति देख के विचार आना कि यहीं बैठ जायें, इनकी गोद में. कभी विचार नहीं आता था कि कोई फ़र्क है. मेरे मित्र मेरे साथ गुरद्वारे जाते. मेरे घनिष्ठ मित्र ने एक सिख कड़ा पहन लिया था. कहता, ‘ज़मीन से जोड़ के रखता है.’ ख़याल नहीं आता था कि मैं उसे सिक्खी के मायने समझाऊं और ख़याल नहीं आता था कि उसके विचार अलग हैं.

आपको भी याद होगा, जब राकेश शर्मा ने अन्तरिक्ष से कहा था ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’, समय ठहर गया था, छाती फूल जाती थी गर्व से जब वो गीत बजता था दूरदर्शन पर. और वो गीत – ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा’ क्या सुर थे गीत के. प्रधानमंत्री जब लाल किले से कहता था कि ‘मेरा भारत महान!’,  लोग हँसते भी थे, पर कहते थे बात तो ठीक ही कहता है; वो जब यह कहता था  ‘पाकिस्तान की नानी याद करा देंगे’ तो लगता था, सही जा रहा है हिंदुस्तान.

सीधा साधा भारत था. जब सब अपना सा था, सब जोड़ता था. जोड़ने वाले गीत जब बजते थे, तो लोग सुनते थे और गुनगुनाते भी थे. हिंदुस्तान शब्द भी सहज ही गर्वान्वित करता था गैर हिन्दुओं को भी. हिन्द के मायने वृहद् थे. 1947 के विभाजन की दुर्भावना से आगे बढ़ गया था देश, ऐसा लगता था कि मतभेद हैं, पर ऐसे हैं कि हिन्दुस्तानी आपस में बैठ के सुलझा लेंगे.

आज सोचता हूं तो ऐसा देश याद आता है बचपन का. समय के साथ कड़वी यादें शायद मिट गयी हों, पर एक बात तो मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भाईचारा ज़्यादा था आज से; मतभेद थे, मनभेद नहीं थे.

मेरी आपकी पीढ़ी, साठ सत्तर के दशक की; बड़ी हुई ऐसी सुरम्यता में और शांत माहौल में, अब लगा रही है आग.  

ऐसा लगता है कि मेरी आपकी पीढ़ी सदियों की कडवाहट और अंतरधार्मिक द्वंदों के इतिहास का हिसाब कुछ ही वर्षों में चुकता करने में लगी है. सोशल मीडिया में अनर्गल द्वेष भरे, सच झूठ के विनाशक मिश्रण से परिपूर्ण विचार आग की तरह फैल रहे हैं. ऐसे जैसे किसी बन्दर के हाथ में उस्तरा आ गया हो ‘इन्टरनेट’ नाम का.

समाज का हर अंश सिर्फ़ अपनी बात सुन रहा है. आपस में वार्तालाप का स्थान ले चुके हैं वैचारिक द्वंद जहाँ विचारों का आदान प्रदान नहीं होता, विचारों की हार और जीत होती है. हर शाम नया द्वंद, हर शाम नयी हार. हर चैनल पर देश जानना चाह रहा है, पर सुन कोई किसी की नहीं रहा.

राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान पर राजनीति होती है; कोई गाने से मना कर देता है और दूसरा भारत माता की जय के साथ उसी सांस में धार्मिक नारे लगाता है. मानो आपको कह रहा हो कि ‘भारत सिर्फ मेरी माता है, मुझसे जो टकराएगा, चूर चूर हो जाएगा.’ राष्ट्रगान में खड़े होने के लिए सर्वोच्च न्यायलय को आदेश पारित करना पड़ता है. अरे! क्यों भई? बैठे बैठे मोटे हो रहे हो, 52 सेकंड् खड़े हो जाओगे तो थोड़ी चर्बी ही गल जाएगी. देश के लिए नहीं, खुद के लिए खड़े हो जाओ.

और हाँ, अपने आप को विशुद्ध भारतीय मानते हुए अगर आप अपने देश में फैल रहे वैमनस्य के विरुद्ध लिखें तो पहले यह देखा जाएगा कि आपका नाम कौन से धर्म से  जुड़ा है. अगर आपका नाम पसंद नहीं आया तो आपको पाकिस्तान जाने के लिए कहा जायेगा, या कनाडा. वैमनस्य भी कैसा! ऐसा कि अगर कहो कि वैमनस्य है, तो आपका पुतला जला के, आपको देशद्रोही करार कर के कहेंगे  ‘कहां है वैमनस्य, नहीं है, मान जाओ नहीं तो?’ अगर सामने आग का खड्डा किसी को दिखाओ, तो कहेंगे, ‘भय मत फैलाओ हमारे भारत में, देश हित की ही बात करो, और तुम हो कौन हमें बताने वाले?’

वन्दे मातरम एक धर्म से सम्बद्ध हो गया है. राष्ट्र ध्वज से परहेज़ है कुछ को, तो कुछ को राष्ट्रवाद से. स्कूल में सरस्वती वंदना से कुछ लोगों को मतभेद हो चला है और ईसाई मिशनरी विद्यालयों को दीवारें ऊंची करनी पड़ रही हैं. क्रिसमस पर अब सब धर्मों के बच्चे कैरोल्स नहीं गाते, ईद पर गैर मुस्लिम बच्चे ईदी का खेल नहीं खेलते.

लगता है सभी धर्म ख़तरे में हैं. किन्तु अगर कहो कि ऐसे विध्वंसक विचारों से भारत ख़तरे में पड़ता है, तो आप ख़तरे  में हैं. अगर सब ख़तरे में है, तो फिर हमला कर कौन रहा है? हम ही हैं जो कर रहे हैं एक दुसरे पर हमला. और अगर कोई ख़तरे में नहीं है, तो फिर इतना शोर क्यों?

कभी रात को अनजान गली से निकल के देखा है? कैसे पहले एक कुत्ता भौंकता है?  फिर ज़ोर से शीघ्र ही पूरी गली के सारे कुत्ते शोर मचाते हैं. एक गली के कुत्तों की आवाज़ सुन दूसरी गली के कुत्ते भी और फिर तीसरी के, चौथी के; थोड़ी देर में सारे मोहल्ले में शोर हो जाता है. कुछ ऐसा ही शोर है आज कल, शायद. सभी चिल्ला रहे हैं, सभी ख़तरे में हैं. और ये याद नहीं कि पहले किस गली में शोर हुआ था. सबकी नींद हराम, किन्तु चुप कराये कौन?

Who let the dogs out?

क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आप कुछ वर्ष पहले तक जो विचार बेहिचक लिख लेते थे, आज लिख कर मिटा देते हैं, फिर लिखते हैं, फिर मिटा देते हैं, और फिर अगर कह भी देते हैं तो आपको कहा जाता है कि कोई हक नहीं आपको कहने का? ऐसे, जैसे सांस घुट सी रही हो. क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आपके बचपन के मित्र अचानक हिन्दू, सिख, मुसलमान का बिल्ला लगाये दिखने लगे और आप स्वयं भी एक कोठरी में बंद होते जा रहे हैं?

मेरे साथ तो हो रहा है. जब मैं दसवी कक्षा का फॉर्म भर रहा था, फार्म में एक स्थान पर धर्म एवं जाति लिखनी थी. मुझे पता नहीं थी अपनी जाति. पिताजी  शास्त्रीजी से प्रेरित थे इसलिए घर में कभी बात ही नहीं की थी कि हम किस जाति से हैं. मां ने फॉर्म में लिखने के लिए बताया, ‘जाट सिख.’ वह भी मुझे याद करना पड़ा कि गलत न लिख दूं. ऐसे माहौल में लालन पालन के बावजूद मैं अचानक कुछ वर्षों से सिख हितों पर सर्वाधिक वैचारिक मंथन और लेखन करने लगा हूं. कोशिश करता हूं साम्यता रखने की, किन्तु सिख हितों की अवहेलना हो उद्वेलित हो जाता हूँ. मेरी कोठरी भी बन रही है. और ऐसा वैमनस्य फैलता रहा तो मेरी ये कच्ची कोठरी पक्की न हो जाए, डरता हूं.

हमारी पीढ़ी ने बेड़ा गर्क किया है हिंदुस्तान का.

विरासत में मिला था, एक खूबसूरत उद्यान, छोड़ के जायेंगे क्या? एक उजड़ा हुआ सामाजिक ढांचा, दुर्भावना से परिपूर्ण संपन्न भारत?

आर्थिक सम्पन्नता का क्या अचार डालेंगे, साहब? क्या लीबिया संपन्न नहीं था? सीरिया हर मापदंड में भारत से अग्रणी था मूलभूत ढांचे और आर्थिक पैमानों पर. क्या हुआ? दो साल में तबाह और शून्य हो गया. क्या सऊदी अरब संपन्न नहीं है? ऐसा भारत चाह रहे हो क्या जो धार्मिक कट्टरवादिता में लिप्त हो? ऐसी सम्पन्नता किस काम की जहां हम एक दुसरे की जान के प्यासे हो जायें, जहां हम इतिहास के विवादों को हवा दें भविष्य को जला दें?

अभी भी समय है. कुछ बात करें. कुछ सोचें मिल जुल कर.  क्या रखा है लड़ने में? धर्मं अधर्म, ईमान कुफ्र, अगले जन्म में कर लेना. नाज़ुक दरारों को जोड़ लो पहले. जिस दिन 1947 जैसा विद्वेष एक खुले सांड जैसे इस नाज़ुक कांच के घर में घुस गया,बिखरने में देर नहीं लगेगी. समय है थोडा सा. बहुत थोडा सा.

खैर, सुना है मेरे ख़ास दोस्त ने मेरा दिया हुआ कड़ा उतार दिया है. उसके जैन धर्म के विरूद्ध हो गया था अचानक. मेरे बचपन का विशाल हिंदुस्तान बड़ा ही संकुचित निकला, और मैं भी.

 

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