जनरल मोहन सिंह! कौन?

आजाद हिन्द फौज (भारतीय राष्ट्रीय सेना) एक दिवस में नहीं बनी. यह एक सतत प्रक्रिया के तहत संस्थापित हुई जिस का उदय १९१५ की ‘ग़दर क्रांति’ के दौरान एक असफल सैन्य क्रांति के साथ हुआ. जो क्रांति प्रथम विश्व युद्ध में प्रारंभ हुई, उसे मूर्त-रूप द्वितीय विश्व युद्ध में मिला.

यदि आप पूछते हैं कि आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना किसने की, तो स्पष्ट है की मोहन सिंह ने की ; यदि आप पूछते हैं कि किसने आज़ाद हिन्द फौज को जीवित किसने रखा तो वह रास बिहारी बोस थे; यदि आप पूछते हैं कि आजाद हिन्द फौज नेतृत्व युद्ध में किसने किया, तो वह सुभाष बोस थे

द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ में मोहन सिंह, मलाया में लड़ रही ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब बटालियन में कप्तान थे। जितरा में जापानी सेना द्वारा कप्तान मोहन सिंह की 1/14 पंजाब रेजिमेंट को हराया गया एवं मोहन सिंह को हिरासत में ले युद्धबंदी घोषित किया गया.

दिसंबर 1941 में मोहन सिंह और प्रीतम सिंह (मलाया में एक गदर पार्टी ऑपरेटर) के साथ जापान के जनरल फूजीमोरी की एक बैठक में आईएनए का विचार पारित किया गया जिसके अंतर्गत भारतीय युद्धबंदियों की एक सेना बनाने का निश्चय किया गया।

सिंगापुर में अंग्रेजों की हार के बाद जापान में 17 फरवरी 1942 को; फुजीमोरा और मोहन सिंह ने पराजित भारतीय बटालियनों (1/14 पंजाब और 5/14 पंजाब) को सिंगापूर के एक विशाल उद्यान में संबोधित किया। जनरल फुजीमोरा ने भारत की मुक्ति के लिए सेना में शामिल होने के लिए भारतीय सैनिकों को स्वेच्छा से आमंत्रित किया; उन्हें वादा किया गया की उन्हें युद्धबंदी (पीओडब्ल्यू) नहीं माना जाएगा, अपितु जापान के दोस्त के रूप में देखा जाएगा। फुजिमारा ने तत्पश्चात युद्धबंदियों की कमान मोहन सिंह के हाथ में सौंपते हुए मोहन सिंह को भाषण के लिए आमंत्रित किया। मोहन सिंह ने भीड़ से हाथ उठाने के लिए पूछा की कि क्या वे मुक्ति सेना में शामिल होने के लिए स्वयंसेवक बनना चाहते हैं। भाई मोहन सिंह ने १९७३ में लिखे अपने संस्करण में कहा है की ” सभी सैनिकों से एक सहज प्रतिक्रिया थी। हाथों को उठाने के साथ-साथ, हवा में हजारों पगड़ियाँ और टोपी उड़ा दी गईं … सैनिक ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ के नारों के साथ उत्साहित हो कूद रहे थे. “

सिंगापूर के उस उद्यान में, १७ फरवरी १९४२ को मोहन सिंह ने आज़ाद हिंद फौज या भारतीय राष्ट्रीय सेनाबनाने का इरादा घोषित किया और स्वयंसेवकों से सेना में शामिल होने के लिए कहा। मोहन सिंह का भाषण उत्साहजनक और प्रेरक था और अनुमान लगाया जाता है उद्यान में मौजूद लगभग 45,000 युद्धबंदी में से आधा से ज्यादा ने आजाद हिन्द फौज में शामिल होने का प्रण लिया।

अप्रैल 1 942 में आजाद हिन्द फौज को औपचारिक रूप से फुजीमोरा के सहयोग से मोहन सिंह द्वारा शुरू की गई थी। कप्तान मोहन सिंह को भारतीय राष्ट्रीय सेना का जनरल नियुक्त किया गया था।

अप्रैल 1942 में जनरल मोहन सिंह ने अपने अधिकारियों के एक समूह की एक बैठक बुलाई जिसे अब बिडादरी रिज़ॉल्यूशन कहा जाता है । इस प्रस्ताव ने घोषणा की कि – भारतीय जाति, समुदाय या धर्म के सभी मतभेदों से ऊपर हैं एवं स्वतंत्रता हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है . इसके लिए लड़ने के लिए एक भारतीय राष्ट्रीय सेना को उठाया जाएगा। संकल्प ने आगे कहा कि – “ आजाद हिन्द फौज केवल तभी युद्ध करेगी जब कांग्रेस और भारत के लोग इसे समर्थन देंगे ।

रास बिहारी बोस के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता लीग (इंडियन इंडिपेंडेंस लीग) ने मई 1942 में आयोजित अपने सम्मेलन में मोहन सिंह को आमंत्रित किया; जहां भारतीय स्वतंत्रता लीग को सर्वोच्च निकाय बनाया गया था और आजाद हिन्द फौज (आईएनए – INA) को इसके मातहत रखा गया था। भारतीय स्वतंत्रता लीग ने बिदादरी संकल्प की पुष्टि की।

आजाद हिन्द फौज के पहले प्रभाग में लगभग 16,000 पुरुष शामिल थे। इसमें 650 सैनिकों के 12 बटालियनों में आयोजित किया जाना था, प्रत्येक 2000 के पुरुषों के 4 रेजिमेंटों में आयोजित किया गया था। बटालियन और रेजिमेंट कमांडरों को 5 सितंबर 1 9 42 को नियुक्त किया गया, एवं 8 – 9 सितंबर को उनके आदेश ग्रहण किए गए। रास बिहारी बोस एवं मोहन सिंह द्वारा आजाद हिन्द फौज की संयुक्त रूप से सलामी ली गयी ।

जनरल मोहन सिंह के तहत आईएनए ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ कई जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों का आयोजन किया और लगातार ब्रिटिश सैनिकों से भारतीय सैनिकों की भर्ती की। नियमित रूप से लोगों को प्रशिक्षित किया गया एवं कमांड की परिचालन श्रृंखला स्थापित की गयी।

मोहन सिंह आजाद हिन्द फौज को जापानी सेना की एक रेजिमेंट/ डिवीज़न का दर्जा नहीं देना चाहते थे एवं स्वतंत्र इकाई की मान्यता चाहते थे; किन्तु जापानी स्वतंत्र सेना की मान्यता रोक रहे थे क्योंकि वे आजाद हिन्द फौज को जापानी सेना का अंग घोषित करना चाहते थे. बिडाडरी रिज़ॉल्यूशन के मुताबिक जापानी अधिकारियों के अधीन भारतीय सैनिकों को सेवा देने से इनकार कर दिया; जिसके कारण असहमति हुई और जनरल फुजीमोरी से बढ़ते अंतर्विरोध के कारण दिसंबर 1 9 42 में, मोहन सिंह को जापानी सैन्य पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा एवं आईएनए को जापान का समर्थन वापस ले लिया गया। जापानी सेना द्वारा आजाद हिन्द फौज के दुरूपयोग के संशय से मोहन सिंह ने गिरफ्तारी पश्चात सेना के विघटन का आदेश पारित किया.

जनरल मोहन सिंह की गिरफ्तारी के बाद भारतीय स्वतंत्रता लीग के नेता के रूप में रास बिहारी बोस ने 1942 और फरवरी 1 943 के बीच आजाद हिन्द फौज को विघटित नहीं होने दिया एवं उसे जोड़ के रखने के लिए जापानियों से वार्तालाप कर 15 फरवरी 1 943 को सेना को लेफ्टिनेंट कर्नल किआनी की कमान मं में जीवित रखा.

हिटलर के जर्मनी के साथ जापानी के समझौते के तहत; कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष – सुभाष चंद्र बोस – को जर्मनी से सिंगापुर भेजकर रास बिहारी बोस से भारतीय राष्ट्रीय सेना का प्रभार लेने के लिए भेजा गया था। मोहन सिंह को इस नई सेना के पहले सत्र को संबोधित करने के लिए बुलाया गया था लेकिन जापानी निर्देशों के अनुरूप उन्हें फौज की कमान से दूर रखा गया। उन पर इलज़ाम लगाया गया की उन्होंने गिरफ्तारी के दौरान आजाद हिन्द फौज को विघटित करने का आदेश दिया था इस लिए उन्हें कमान से दूर रखा जायेगा.

इस तरह, इतिहास गवाह है कि मोहन सिंह द्वारा विशिष्ठ रूप से प्रशिक्षित, पूर्ण रूप से संघटित, आजाद हिन्द फौज सुभाष चंद्र बोस की कमान में सौंप दी गयी. हम सभी बाकी की कहानी से परिचित हैं, जानते हैं कि सुभाष बोस ने किस तरह अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे।

आज के इतिहासकार आईएनए को दो युग में विभाजित करते हैं – आईएनए प्रथम और आईएनए द्वितीय ; मोहन सिंह की ‘आईएनए प्रथम ‘ और बोस की ‘आईएनए द्वितीय‘। तटस्थ पर्यवेक्षक के रूप में यह विभाजन थोड़ा अनुचित लगता है कि भारत ने तथाकथित आईएनए प्रथम की विरासत को पूरी तरह से त्याग दिया है; जिसके बिना आईएनए प्रथम के आईएनए द्वितीय का उदय कदापि होता ही नहीं। मेरे विचार में सिर्फ एक ही आईएनए थी और शेष इसका विकास था।

हम ये न भूलें की आजाद हिन्द फौज का विचार १९१५ की ग़दर क्रांति में उत्पन्न हुआ. ग़दर पार्टी के प्रीतम सिंह ढिल्लों को श्रेय है जिन ने गुप्त रूप से मलाया में गदर पार्टी के सदस्य के रूप में संचालित थे और जापानी के खुफिया कार्यकर्ताओं के संपर्क में थे। मोहन सिंह से पहले आईएनए के लिए पुस्तिकाएं प्रीतम सिंह द्वारा मुद्रित की गई थीं। उन्होंने पंजाबी में मुद्रित पुस्तिकाएं मलाया में लड़ रहे पंजाब बटालियन इकाइयों पर गिरा भारतीय सेना के लिए स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए कहा। प्रीतम सिंह ढिल्लों ने मोहन सिंह और जनरल फुजिमारा को विश्वास दिलाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई कि ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय युद्धबंदियों में से एक भारतीय सेना का गठन किया जा सकता है। अफसोस की बात है कि आईएनए के गठन में प्रीतम सिंह की भूमिका को इतिहास में दफन दिया गया है।

जापान की हार के बाद , मोहन सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और कोर्ट मार्शल का सामना किया। हालांकि, आईएनए लाल किले में चले मुक़द्दमों से जुड़ी सार्वजनिक भावनाओं के मद्देनजर मोहन सिंह को सेना से ही निकासित किया गया एवं कोई और सज़ा नहीं दी गयी । आज़ादी के पश्चात भाई मोहन सिंह ने भारतीय संसद के ऊपरी सदन के सदस्य के रूप में कार्य किया।

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