एक ख़ास दोस्त की वाल पर इस चित्र में विशेषण देखे, श्री मोदी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में. कुछ विशेषण तो ऐसे हैं जैसे विष्णु अवतार, श्री राम, के बारे में तुलसीदास जी ने व्याख्या की हो. ऐसी ऐसी उपमाएं की रामचरितमानस भी लजा जाए.

“अनादि, अनंत, अजर, अमर, अविनाशी!” – अब यह सब उपमाएं तो अवतारों को ही दी जाती थी. एक जीते जागते हाड़ मांस के जनतांत्रिक नेता पर क्या यह विशेषण शोभा देते हैं!
सवाल यह उठता है की जनतंत्र में इस प्रकार की चाटुकारिता एवं पुरुष विशेष के महिमा मंडन का क्या मूल्य चुकाना पढ़ सकता है. इतिहास में इसके जवाब हैं. इतिहास गवाह है की जनतंत्र एक मौलिक व्यवस्था नहीं है एवं अत्यधिक नश्वर है. जब भी इतिहास में जनतंत्र ने पैर पसारे, किसी न किसी व्यक्ति ने उसे विध्वंस कर दिया, देर सवेर.
करीब ३५० बी.सी से पहले की बात है. भारत में जनतंत्र हुआ करते थे. छोटे छोटे कई जनपद थे, पूरी तरह जनतांत्रिक. वैशाली एक विशाल जनपद था जिसमें प्रजा का राज्य था. धीरे धीरे सभी जनतंत्र, राजतंत्र में परिवर्तित हो गए. शुरुआत की, शायद मेरे ख्याल से, अजातशत्रु ने मगध जनपद पर कब्ज़ा कर फिर वैशाली के जनतंत्र का विध्वंस कर. उसके बाद, जनतंत्र का उदय भारत वर्ष में २३०० वर्ष बाद हुआ.
कुछ ऐसा ही, रोमन जनतंत्र के साथ हुआ जब जूलियस सीज़र ने जनतंत्र में इसी प्रकार का महिमा मंडन करवाया. उसके समय में जनतंत्र पर तानाशाही हावी हो गयी थी. उसके बाद सीज़र ऑगस्टस ने अपने आप को रोम का पहला राजा ही घोषित कर दिया और रोम का जनतंत्र हमेशा के लिए ख़त्म हो गया. एक बार जो जनतंत्र समाप्त हुआ तो २३०० वर्ष तक इटली में वापिस नहीं आ पाया.
विश्व इतिहास में जनतंत्र कोई १६ सदियों तक दोबारा नहीं दिखा जब तक ब्रिटेन में इसका आंशिक अवतरण हुआ. तत्पश्चात फ्रांस गणराज्य बना एवं तत्पश्चात अमरीका में जनतंत्र ने पैर फैलाये.
अफ्रीका के कई देशों में जनतंत्र ने पैर रखे पर पैर जमा नहीं पाया. मध्यपूर्वी एशिया में इस्लामिक राष्ट्रों में कभी भी जनतंत्र पैर नहीं जमा पाया. भारत जब आज़ाद हुआ, हमारा जनतंत्र बेहद नाज़ुक था, हमारे पड़ोसी पाकिस्तान की तरह. रोबर्ट मुगाबे, इदी अमीन, याह्या खान, गद्दाफी, नासिर, चौचेस्कू, मार्कोस… हमारे चारों ओर तानाशाह ही तानाशाह थे, जिनके बीच में भारत का जनतंत्र अंकुरित हो रहा था. आज भी सिवाय भारत के बहुत ही गिने चुने राष्ट्र हैं जहां जनतंत्र फल फूल रहा है.
भारत के जनतंत्र को धीरे धीरे एक नाज़ुक पौधे की तरह सींचा गया. नेहरूजी के नेतृत्व में जीवित नेतायों के महिमा मंडन पर विशेष रूप से परहेज़ था. (हाँ, बापू गाँधी का ज़रूर एक ख़ास स्थान था, पर वह ख़ास स्थान पूरे विश्व में था, और वह स्थान शाषण और सरकार से दूर था, इसलिए उस से जनतंत्र को कोई खतरा नहीं था). लोक सभा हो या राज्य सभा, एक स्वस्थ संवाद होता था. मीडिया एवं पत्रकारिता के कई ऐसे दिग्गज थे जिन्होंने लपेट लपेट कर शाषण कर रहे नेतायों पर वार किये.
इंदिरा गांधी ने पहली बार इस प्रकार का व्यक्ति-विशेष चाटुकारिता का युग प्रारंभ किया, जिसका फल हुआ इमरजेंसी के स्वरुप में. इश्वर की दया से इंदिरा गाँधी की तानाशाही का पटाक्षेप जल्द ही हो गया एवं हमारा जनतंत्र सुद्रढ़ होता गया.
आज इस व्यक्ति का महिमा मंडन बढ़ता जाएगा और जल्द ही, १९७७ की तरह, हमारा जनतंत्र दोराहे पर आ जाएगा जहाँ से एक रास्ता गणतंत्र की तरफ और एक रास्ता राजतंत्र की ओर जाएगा… १९७७ में हमारी जनता ने कमाल की वापसी की थी, एक महारानी के हाथ से तख़्त खींच कर.. सवाल यह है की क्या इस बार भी हमारे जन में वह ताकत रहेगी?
आज जब एक व्यक्ति विशेष की ऐसी पूजा देखी तो ऐसा लगा कि जनतंत्र के मायने क्या हैं, उस पर मंथन की आवश्यकता है. मंथन की आवश्यकता है, पर यह भी हम सब को पता है, मंथन होगा नहीं.
